Monday, 7 June 2010
कला संवर्द्धन को संस्कार भारती की इकाई गठित
मुजफ्फरपुर, प्रतिनिधि : जिले के सांस्कृतिक माहौल को गति देने के लिए मंगलवार को संस्कार भारती की ओर से कलाकारों की नई इकाई गठित की गई। बालूघाट स्थित प्रसिद्ध तबलावादक सतीश महाराज की आवास पर आयोजित बैठक का उद्घाटन संस्था के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अमीर चंद ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में कला के विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाकर उनकी प्रस्तुति कराई जाएगी। इससे यहां के कलाकारों का उत्साहवर्द्धन होगा। बैठक में कलाकारों की नई कमेटी भी गठित की गई जिसके अध्यक्ष के रूप में सतीश महाराज को चुना गया। वहीं, राकेश कुमार को महामंत्री, अरविंद कुमार व सतीश चंद्र मिश्रा को उपाध्यक्ष, शिवशंकर मिश्र व धनंजय कुमार को उप महामंत्री बनाया गया। बैठक में नृत्यांगना डा.रंजना सरकार, संस्था के प्रांतीय महामंत्री सुशील कुमार कर्ण, प्रांतीय संगठन मंत्री गणेश प्रसाद सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित थे। Dainik Jagran
गौरवशाली है मुजफ्फरपुर का इतिहास
मुजफ्फरपुर बिहार के सबसे बड़े शहरों में से एक है। यह जिला मुख्यालय के साथ-साथ तिरहुत प्रमंडल का हेडक्वाटर भी है। अपने सूती वस्त्र उद्योग के साथ आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिए यह पूरी दुनिया में जाना जाता है। बज्जिका यहां की बोली है और हिन्दी तथा उर्दू यहां की मुख्य भाषाएं। तिरहुत कहलाने वाले इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण जैसे ग्रंथों में भी मिलता है लेकिन इसका लिखित इतिहास वैशाली के उद्भव के समय से उपलब्ध है। मिथिला के राजा जनक के समय तिरहुत प्रदेश मिथिला का अंग था। बाद में राजनैतिक शक्ति विदेह से वैशाली की ओर हस्तांतरित हुई। तीसरी सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से यह पता चलता है कि यह क्षेत्र काफी समय तक महाराजा हर्षवर्धन के शासन में रहा। उनकी मृत्यु केबाद स्थानीय क्षत्रपों का कुछ समय शासन रहा तथा आठवीं सदी के बाद यहां बंगाल के पाल वंश के शासकों का शासन शुरू हुआ जो 1019 तक जारी रहा। तिरहुत पर लगभग 11 वीं सदी में चेदि वंश का भी कुछ समय शासन रहा। सन 1211 से 1226 बीच गैसुद्दीन एवाज तिरहुत का पहला मुसलमान शासक बना। चंपारण के सिमरांव वंश के शासक हरसिंह देव के समय 1323 में तुगलक वंश के शासक गयासुद्दीन तुगलक ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया लेकिन उसने सत्ता मिथिला के शासक कामेश्र्वर ठाकुर को सौंप दी। चौदहवीं सदी के अंत में तिरहुत समेत पूरे उत्तरी बिहार का नियंत्रण जौनपुर के राजाओं के हाथ में चला गया जो तबतक जारी रहा जबतक दिल्ली सल्तनत के सिकन्दर लोदी ने जौनपुर के शासकों को हराकर अपना शासन स्थापित नहीं किया। इसके बाद विभिन्न मुगल शासकों और बंगाल के नवाबों के प्रतिनिधि इस क्षेत्र का शासन चलाते रहे। पठान सरदार दाऊद खान को हराने के बाद मुगलों ने नए बिहार प्रांत का गठन किया जिसमें तिरहुत को शामिल कर लिया गया। 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद यह क्षेत्र सीधे तौर पर अंग्रेजी हुकूमत केअधीन हो गया। 1875 में प्रशासनिक सुविधा के लिए तिरहुत का गठन कर मुजफ्फरपुर जिला बनाया गया। मुजफ्फरपुर ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अत्यंत महत्वपूणर् भूमिका निभाई । महात्मा गांधी की दो यात्राओं ने इस क्षेत्र के लोगों में स्वाधीनता के चाह की नई जान फूंकी थी। खुदीराम बोस तथा जुब्बा साहनी जैसे अनेक क्रांतिकारियों की यह कर्मभूमि रही है। 1930 के नमक आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय तक यहां के क्रांतिकारियों के कदम लगातार आगे बढ़ते रहे। मुजफ्फरपुर का वर्तमान नाम ब्रिटिश काल के राजस्व अधिकारी मुजफ्फर खान के नाम पर पड़ा है। 1972 तक मुजफ्फरपुर जिले में शिवहर, सीतामढ़ी तथा वैशाली जिला शामिल था। मुजफ्फरपुर को इस्लामी और हिन्दू सभ्यताओं की मिलन स्थली के रूप में भी जाना जाता रहा है। दोनों सभ्यताओं के रंग यहां गहरे मिले हुए हैं और यही इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान भी है। प्रस्तुति : एम. अखलाक Dainik Jagran
Thursday, 25 March 2010
MF HUSSAIN, Bhagora


देवी-देवताओं की अश्लील पेंटिंगों को हुसैन की संकीर्ण सोच की उपज बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश हुसैन पर हाय-तौबा मकबूल फिदा हुसैन भारत में छद्म पंथनिरपेक्ष भीड़ के नायक रहे हैं। इसीलिए अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग उनके कतर देशांतर पर प्रलाप कर रहा है और हिंदुओं पर उनके पीछे पड़ने का आरोप मढ़ रहा है। कुछ टीवी एंकर हुसैन के भारत की नागरिकता छोड़ कर कतर की नागरिकता लेने पर चीत्कार मचा रहे हैं किंतु वे हुसैन की कलात्मक स्वच्छंदता की सच्चाई बताने के इच्छुक नहीं हैं। इसलिए अब समय है कि हुसैन के बारे में कुछ गरम पहलुओं से परदा उठाएं। श्रीमान हुसैन को भारत से भागने के लिए किसने मजबूर किया? एंटी हिंदूज पुस्तक के लेखक प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा कुछ महत्वपूर्ण सुराग और इस सवाल का विस्तार से उत्तर देते हैं। इस पुस्तक में न केवल संस्कार भारती के डीपी सिन्हा की प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की गई है, बल्कि हुसैन की बेहद घिनौनी पेंटिगों की तस्वीरें भी छपी हैं। असलियत में, यह प्रेस विज्ञप्ति चित्रकार के खिलाफ विस्तृत आरोपपत्र ही है क्योंकि इसमें पेंटिंगों को एक से बढ़कर एक भौंडी और निंदनीय बताया गया हैं। यहां इस संगठन द्वारा आठ सर्वाधिक आपत्तिजनक पेंटिंगों की सूची जारी की गई है। पहली पेंटिंग का शीर्षक दुर्गा है, जिसमें दुर्गा देवी को एक टाइगर के साथ रति क्रिया रत दिखाया गया है। रेस्क्यूइंग सीता पेंटिंग में नग्न सीता को हनुमान की पूंछ पकड़े चित्रित किया गया है। हनुमान की पूंछ शालीनता की तमाम सीमाओं को लांघते हुए एक लैंगिग प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। भगवान विष्णु को आम तौर पर चार हाथों के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र होते हैं। किंतु हुसैन की पेंटिंग में विष्णु के हाथ काट दिए गए हैं। यही नहीं उनके पैर भी कटे हुए हैं। विकृत और थकेहारे विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी और वाहन गरुड़ की ओर देख रहे हैं। भगवान विष्णु के हाथ-पैर काटना रचनात्मक स्वतंत्रता है या फिर हिंदू संवेदना का जानबूझ कर अपमान करना है? सरस्वती जिन्हें हिंदू एक देवी के रूप में पूजते हैं, श्वेत साड़ी में चित्रित की जाती हैं। इन्हें भी हुसैन ने अपनी पेंटिंग में नग्न दर्शाया है। एक अन्य पेंटिंग में नग्न देवी लक्ष्मी देव गणेश के सिर पर सवार हैं। इस दृश्य से भी कामुकता झलकती है। हनुमान-4 शीर्षक से एक पेंटिंग में तीन मुख वाले हनुमान और एक नग्न युगल चित्रित किया गया है। महिला की पहचान संदेह से परे है। हनुमान का जननांग महिला की ओर दिखाया गया है। इसमें अश्लीलता बिल्कुल स्पष्ट झलकती है। हनुमान-13 शीर्षक वाली पेंटिंग में बिल्कुल नग्न सीता नग्न रावण की जांघ पर बैठी हैं और नग्न हनुमान उन पर वार कर रहे हैं। एक अन्य पेंटिंग जार्ज वाशिंगटन एंड अर्जुन आन द चैरियट में महाभारत के प्रसिद्ध गीता प्रसंग की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण का स्थान वाशिंगटन ने ले लिया है क्योंकि भगवान कृष्ण की आंखों में कोई देवत्व नहीं है और उनकी अवमानना करते हुए उन्हें महज एक मानव जार्ज वाशिंगटन के रूप में पेश किया गया है। क्या हुसैन का यह मूर्तिभंजन एकसमान है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। बात जब गैर हिंदू विषयों की आती है तो हुसैन आदर और सम्मान के प्रतिमान स्थापित कर लेते हैं। वह पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा को पवित्रता और शिष्टता के साथ चित्रित किया है, जो कपड़े पहने हुए हैं। यहां चित्रकार कोई छूट नहीं लेता। वह तब भी कोई छूट नहीं लेता जब उनकी बेटी और माता का चित्रण करता है। हुसैन की मदर टैरेसा पेंटिंग कला का लाजवाब नमूना है, जिसमें मदर टैरेसा करुणा की प्रतिमूर्ति लगती हैं। अगर ऐसा है तो हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं को इस कदर घिनौने अंदाज में क्यों चित्रित किया? इसका जवाब एक और पेंटिंग में मिलता है। एक पेंटिंग में आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर चित्रित किए गए हैं, जिनमें से केवल हिटलर को नग्न दिखाया गया है। क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिन चरित्रों को हुसैन घिनौना मानते हैं उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? इन निंदनीय कला कर्म को पुनर्प्रकाशित करने और संस्कार भारती की विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा एमएफ हुसैन को विकृत कामवासना से ग्रस्त व्यक्ति बताते हैं। इन पेंटिंग के फोटोग्राफ मौलिक रूप से एक ऐसी पुस्तक में प्रकाशित हुए थे, जिसे खुद हुसैन ने डिजाइन किया था। लेखकों ने सिन्हा द्वारा पेश किए गए आठ उदाहरणों में अपनी तरफ से भी तीन जोड़े हैं। इनमें एक पेंटिंग में सांड को पार्वती से सहवास करते दिखाया गया है, जबकि शंकर उनकी तरफ देख रहे हैं। दूसरी में हनुमान के जननांग को एक औरत की ओर दर्शाया गया है और एक पेंटिंग में नग्न कृष्ण के हाथ-पैर कटे हुए दिखाए गए हैं। लेखक नंग्नता, अश्लीलता और कामविकृति में भेद की तरफ ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं, जब अश्लीलता या कामविकृति के साथ देवी-देविताओं को चित्रित किया जाता है तो यह आस्था के साथ खिलवाड़ करने की श्रेणी में आता है। जैसाकि गोर्दिया और पांडा रेखांकित करते हैं, हुसैन को संदेह का लाभ देना बिल्कुल संभव नहीं है। आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर के चित्रण वाली पेंटिंग अकाट्स साक्ष्य है। पहले तीन के शरीर पर कपड़े हैं, जबकि हिटलर नग्न है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि जिनसे वह घृणा करते हैं, उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? वे पूछते हैं, क्या हिंदू का सम्मान करने वाला कोई भी व्यक्ति हुसैन को माफ कर सकता है? इसका जवाब स्पष्ट तौर पर ना है। तो हुसैन की कला से प्रताडि़त किसी हिंदू को क्या करना चाहिए? कुछ ऐसे असभ्य लोगों को छोड़कर जिन्होंने कानून अपने हाथ में लेकर चित्रकार की कुछ पेंटिंग प्रदर्शनियों में तोड़फोड़ की, अधिकांश हिंदुओं की प्रतिक्रिया वही थी, जो एक लोकतंत्र में होनी चाहिए। उन्होंने अदालत की शरण ली और चित्रकार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए। उन्होंने कानून का सहारा लिया जो नागरिकों को अन्य नागरिकों की पंथिक संवेदनाओं पर आघात करने से रोकता है। उन्हें जान से मारने की धमकी नहीं दी गई और इस तरह के भद्दी घोषणाएं नहीं की गई जैसी उत्तर प्रदेश में एक मुसलमान ने डेनमार्क के काटूर्निस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ रुपए देने की पेशकश के रूप में की थी, जिसने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाया था। अगर आप कुछ टीवी एंकरों के हावभाव पर गौर करें तो इस ईश-निंदा के घटिया तरीके पर हिंदुओं की लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया के लिए कोई सराहना नहीं की जानी चाहिए, बल्कि अदालत में खींचने के लिए इनकी भर्त्सना की जानी चाहिए। हुसैन के मित्र और प्रशंसक जो भी कहें, सच्चाई यह है कि हिंदू भावनाओं के साथ इस प्रकार की घृणित खिलवाड़ के कारण वह कानूनी रूप से भगोड़ा घोषित हैं। जबसे उन पर मामले दर्ज किए गए हैं, वह फरार चल रहे हैं। बहुत से हिंदू जो हुसैन की इस घिनौनी कला से परिचित हैं, उन्हें कतरनाक पेंटर बताते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि उनके लिए कतर ही उनकी अंतिम मंजिल थी! किंतु अगर हम अपनी पंथनिरपेक्ष परंपरा को मान देते हैं तो हमें उन्हें बचकर भाग निकलने नहीं देना चाहिए। कानून की लंबी बांह को कतर तक जाना चाहिए। हमें उनका प्रत्यारोपण करके 80 करोड़ भावनाओं पर चोट पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 25.03.2010 Dainik Jagran, Muzaffarpur
Thursday, 25 February 2010
वाह संजीव, जीना कोई तुमसे सीखे
सुजीत कुमार पप्पू, मुजफ्फरपुर : कोई कल्पना कर सकता है कि हादसे में दोनों पैर गंवा बैठा शख्स एक पल भी शोक में नहीं गुजारता, बल्कि इलाज और दवा से मुक्ति पाने के तत्काल बाद अपने लक्ष्य को पाने की ओर कदम बढ़ा देता है, लक्ष्य पा भी लेता है? नहीं न? लेकिन, मुजफ्फरपुर में है ऐसा ही एक शख्स। नाम है संजीव कुमार, उम्र 36 वर्ष और रहता है दाउदपुर कोठी (एमआईटी) मोहल्ले में। वह नजीर है समाज के लिए और प्रेरणा है उन लोगों के लिए जो छोटे-छोटे हादसे में टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं। एक ट्रेन हादसे में दोनों पैर गंवा चुके संजीव ने ह्वीलचेयर के सहारे न केवल एमसीए किया, बल्कि नया साफ्टवेयर बनाकर कंप्यूटर की दुनिया में कीर्तिमान भी स्थापित कर दिया। उनके बनाए साफ्टवेयर का आज सूबे के हजारों व्यवसायी इस्तेमाल कर रहे हैं। संजीव अब कात्यायनी सिल्कन डाटा सिस्टम (केएसडीएस) प्रा. लि. कंपनी के नाम से इस साफ्टवेयर को देश स्तर पर उतारने की योजना बना रहे हैं। वे इस कंपनी के प्रबंध निदेशक भी हैं। दरअसल, दोनों पैरों से अपाहिज इस युवक ने नियति के क्रूर मजाक को वरदान के रूप में लिया। सकारात्मक सोच ही उनकी ताकत है। संजीव कहते हैं, प्रकृति सभी को अवसर देती है। मेरे साथ हुई घटना को लोग प्रकृति का मजाक समझने लगे, लेकिन मैंने इसे अवसर मानकर सकारात्मक सोच बनाए रखी और परिणाम है कि आज इस मुकाम पर हूं। उनका कहना है कि सभी अपाहिज, विकलांग, नि:शक्त व बेसहारा लोगों को उपलब्ध साधनों के बल अपने अंदर संचित ऊर्जा का इस्तेमाल करना चाहिए। कार्य मुश्किल हो सकता है, असंभव नहीं। विज्ञान के मेधावी छात्र व कंप्यूटर के दीवाने संजीव कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के कार्य से 22 अप्रैल 2001 को खगडि़या से घर लौट रहे थे। बरौनी स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने के दौरान धक्का लगने से गिरे और जांघ के नीचे से उनके दोनों पैर कट गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत न हारी। उस समय वे एक तरफ कंप्यूटर का डिप्लोमा कोर्स और दूसरी तरफ कंप्यूटर आपरेटिंग का जॉब भी कर रहे थे। जॉब के ही दौरान लोगों की विभिन्न व्यावसायिक समस्याओं से रूबरू हुए। इसी के मद्देनजर एक व्यावसायिक साफ्टवेयर में दिमाग लगाया और उसका निर्माण कर दिया, जो मेडिकल स्टोर्स, एफएम सीजी, मोटर पार्ट्स, स्कूल, कालेज आदि के लिए उपयुक्त साबित हुआ। 19 Feb 2010 Jagranवाह संजीव, जीना कोई तुमसे सीखे
सुजीत कुमार पप्पू, मुजफ्फरपुर : कोई कल्पना कर सकता है कि हादसे में दोनों पैर गंवा बैठा शख्स एक पल भी शोक में नहीं गुजारता, बल्कि इलाज और दवा से मुक्ति पाने के तत्काल बाद अपने लक्ष्य को पाने की ओर कदम बढ़ा देता है, लक्ष्य पा भी लेता है? नहीं न? लेकिन, मुजफ्फरपुर में है ऐसा ही एक शख्स। नाम है संजीव कुमार, उम्र 36 वर्ष और रहता है दाउदपुर कोठी (एमआईटी) मोहल्ले में। वह नजीर है समाज के लिए और प्रेरणा है उन लोगों के लिए जो छोटे-छोटे हादसे में टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं। एक ट्रेन हादसे में दोनों पैर गंवा चुके संजीव ने ह्वीलचेयर के सहारे न केवल एमसीए किया, बल्कि नया साफ्टवेयर बनाकर कंप्यूटर की दुनिया में कीर्तिमान भी स्थापित कर दिया। उनके बनाए साफ्टवेयर का आज सूबे के हजारों व्यवसायी इस्तेमाल कर रहे हैं। संजीव अब कात्यायनी सिल्कन डाटा सिस्टम (केएसडीएस) प्रा. लि. कंपनी के नाम से इस साफ्टवेयर को देश स्तर पर उतारने की योजना बना रहे हैं। वे इस कंपनी के प्रबंध निदेशक भी हैं। दरअसल, दोनों पैरों से अपाहिज इस युवक ने नियति के क्रूर मजाक को वरदान के रूप में लिया। सकारात्मक सोच ही उनकी ताकत है। संजीव कहते हैं, प्रकृति सभी को अवसर देती है। मेरे साथ हुई घटना को लोग प्रकृति का मजाक समझने लगे, लेकिन मैंने इसे अवसर मानकर सकारात्मक सोच बनाए रखी और परिणाम है कि आज इस मुकाम पर हूं। उनका कहना है कि सभी अपाहिज, विकलांग, नि:शक्त व बेसहारा लोगों को उपलब्ध साधनों के बल अपने अंदर संचित ऊर्जा का इस्तेमाल करना चाहिए। कार्य मुश्किल हो सकता है, असंभव नहीं। विज्ञान के मेधावी छात्र व कंप्यूटर के दीवाने संजीव कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के कार्य से 22 अप्रैल 2001 को खगडि़या से घर लौट रहे थे। बरौनी स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने के दौरान धक्का लगने से गिरे और जांघ के नीचे से उनके दोनों पैर कट गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत न हारी। उस समय वे एक तरफ कंप्यूटर का डिप्लोमा कोर्स और दूसरी तरफ कंप्यूटर आपरेटिंग का जॉब भी कर रहे थे। जॉब के ही दौरान लोगों की विभिन्न व्यावसायिक समस्याओं से रूबरू हुए। इसी के मद्देनजर एक व्यावसायिक साफ्टवेयर में दिमाग लगाया और उसका निर्माण कर दिया, जो मेडिकल स्टोर्स, एफएम सीजी, मोटर पार्ट्स, स्कूल, कालेज आदि लिए उपयुक्त साबित हुआ। 19 Feb 2010 Jagran
Friday, 12 February 2010
संस्कार भारती के समागम में 4 राज्यों के सांस्कृतिक दल का जमावड़ा मुजफ्फरपुर
संस्कार भारती के समागम में 4 राज्यों के सांस्कृतिक दल का जमावड़ा मुजफ्फरपुर, वरीय संवाददाता : पूर्वोत्तर राज्यों की आम जनता में हिन्दी भाषियों के प्रति कोई द्वेष नहीं है। आप-हम भारतीय परिवार के सदस्य हैं। आपलोगों का सिक्किम, अरुणाचल, मणिपुर और असम में स्वागत है। सांस्कृतिक समागम से हमारी भावनात्मक लय और विराट हो जाएगी। उक्त बातें पूर्वोत्तर राज्यों से आए सांस्कृतिक दलों के प्रमुख मणिपुर की रूपा श्री, सिक्किम की ललिता लांबा, अरुणाचल की वामिन रीता व असम के चित्रकार मणि बारदोलोई ने कही। अभिनेत्री व नृत्यांगना रूपा श्री ने कहा कि किसी भी राज्य की जनता हिन्दी भाषा और बिहारियों के प्रति द्वेष नहीं रखती है। प्राकृतिक सौंदर्य व सहजता के बीच रहने वाली उक्त राज्यों की जनता कभी मानवता के विरुद्ध नहीं जा सकती है। अलगाववादी व उग्रवादी तत्व पूरी जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। जनता का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व तो हम कर रहे हैं और हमारी कला व सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन इस बात को प्रमाणित भी कर देंगे। सोमवार को सांस्कृतिक महोत्सव का मुख्य आकर्षण, रास, लोक नृत्य और मार्शल आर्ट में तलवारबाजी आदि रहेगा। सांस्कृतिक समागम संस्कार भारती के तत्वावधान में हुआ। बंसल भवन में आयोजित सांस्कृतिक समागम का उद्घाटन संस्कार भारती के प्रदेश अध्यक्ष व प्रसिद्ध गीतकार डा. शिवदास पाण्डेय ने किया। महानगर अध्यक्ष डा. संजय पंकज ने कहा कि बिहार की सांस्कृतिक राजधानी में आपका स्वागत है। सांस्कृतिक समागम में स्वागताध्यक्ष भारत भूषण ने सभी का स्वागत करते हुए सोमवार को होने वाले कार्यक्रम की सफलता की कामना की। संचालन गणेश प्रसाद सिंह ने किया व संयोजक राजीव कुमार ने आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर विश्वनाथ प्रसाद सिंह, अशोक तिवारी, भोला शंकर, सतीश कर्ण, जितेन्द्र कुमार, ने आयोजन की सफलता व आए अतिथियों के प्रति कृतज्ञता जताई। शहर के कलाकारों व गणमान्य लोगों में नंदलाल मिश्र, सिद्धिशंकर मिश्र, राकेश मिश्र, ऊषा, अर्चना, पल्लवी, पिंकी, अमरेन्द्र तिवारी, संतोष आदि मौजूद रहे। समागम का समापन वंदे मातरम् से हुआ। पूर्वोत्तर की जनता में नहीं है द्वेष
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