Monday, 7 June 2010
कला संवर्द्धन को संस्कार भारती की इकाई गठित
मुजफ्फरपुर, प्रतिनिधि : जिले के सांस्कृतिक माहौल को गति देने के लिए मंगलवार को संस्कार भारती की ओर से कलाकारों की नई इकाई गठित की गई। बालूघाट स्थित प्रसिद्ध तबलावादक सतीश महाराज की आवास पर आयोजित बैठक का उद्घाटन संस्था के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अमीर चंद ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में कला के विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाकर उनकी प्रस्तुति कराई जाएगी। इससे यहां के कलाकारों का उत्साहवर्द्धन होगा। बैठक में कलाकारों की नई कमेटी भी गठित की गई जिसके अध्यक्ष के रूप में सतीश महाराज को चुना गया। वहीं, राकेश कुमार को महामंत्री, अरविंद कुमार व सतीश चंद्र मिश्रा को उपाध्यक्ष, शिवशंकर मिश्र व धनंजय कुमार को उप महामंत्री बनाया गया। बैठक में नृत्यांगना डा.रंजना सरकार, संस्था के प्रांतीय महामंत्री सुशील कुमार कर्ण, प्रांतीय संगठन मंत्री गणेश प्रसाद सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित थे। Dainik Jagran
गौरवशाली है मुजफ्फरपुर का इतिहास
मुजफ्फरपुर बिहार के सबसे बड़े शहरों में से एक है। यह जिला मुख्यालय के साथ-साथ तिरहुत प्रमंडल का हेडक्वाटर भी है। अपने सूती वस्त्र उद्योग के साथ आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिए यह पूरी दुनिया में जाना जाता है। बज्जिका यहां की बोली है और हिन्दी तथा उर्दू यहां की मुख्य भाषाएं। तिरहुत कहलाने वाले इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण जैसे ग्रंथों में भी मिलता है लेकिन इसका लिखित इतिहास वैशाली के उद्भव के समय से उपलब्ध है। मिथिला के राजा जनक के समय तिरहुत प्रदेश मिथिला का अंग था। बाद में राजनैतिक शक्ति विदेह से वैशाली की ओर हस्तांतरित हुई। तीसरी सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से यह पता चलता है कि यह क्षेत्र काफी समय तक महाराजा हर्षवर्धन के शासन में रहा। उनकी मृत्यु केबाद स्थानीय क्षत्रपों का कुछ समय शासन रहा तथा आठवीं सदी के बाद यहां बंगाल के पाल वंश के शासकों का शासन शुरू हुआ जो 1019 तक जारी रहा। तिरहुत पर लगभग 11 वीं सदी में चेदि वंश का भी कुछ समय शासन रहा। सन 1211 से 1226 बीच गैसुद्दीन एवाज तिरहुत का पहला मुसलमान शासक बना। चंपारण के सिमरांव वंश के शासक हरसिंह देव के समय 1323 में तुगलक वंश के शासक गयासुद्दीन तुगलक ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया लेकिन उसने सत्ता मिथिला के शासक कामेश्र्वर ठाकुर को सौंप दी। चौदहवीं सदी के अंत में तिरहुत समेत पूरे उत्तरी बिहार का नियंत्रण जौनपुर के राजाओं के हाथ में चला गया जो तबतक जारी रहा जबतक दिल्ली सल्तनत के सिकन्दर लोदी ने जौनपुर के शासकों को हराकर अपना शासन स्थापित नहीं किया। इसके बाद विभिन्न मुगल शासकों और बंगाल के नवाबों के प्रतिनिधि इस क्षेत्र का शासन चलाते रहे। पठान सरदार दाऊद खान को हराने के बाद मुगलों ने नए बिहार प्रांत का गठन किया जिसमें तिरहुत को शामिल कर लिया गया। 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद यह क्षेत्र सीधे तौर पर अंग्रेजी हुकूमत केअधीन हो गया। 1875 में प्रशासनिक सुविधा के लिए तिरहुत का गठन कर मुजफ्फरपुर जिला बनाया गया। मुजफ्फरपुर ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अत्यंत महत्वपूणर् भूमिका निभाई । महात्मा गांधी की दो यात्राओं ने इस क्षेत्र के लोगों में स्वाधीनता के चाह की नई जान फूंकी थी। खुदीराम बोस तथा जुब्बा साहनी जैसे अनेक क्रांतिकारियों की यह कर्मभूमि रही है। 1930 के नमक आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय तक यहां के क्रांतिकारियों के कदम लगातार आगे बढ़ते रहे। मुजफ्फरपुर का वर्तमान नाम ब्रिटिश काल के राजस्व अधिकारी मुजफ्फर खान के नाम पर पड़ा है। 1972 तक मुजफ्फरपुर जिले में शिवहर, सीतामढ़ी तथा वैशाली जिला शामिल था। मुजफ्फरपुर को इस्लामी और हिन्दू सभ्यताओं की मिलन स्थली के रूप में भी जाना जाता रहा है। दोनों सभ्यताओं के रंग यहां गहरे मिले हुए हैं और यही इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान भी है। प्रस्तुति : एम. अखलाक Dainik Jagran
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